Breaking News
इंडियन प्रीमियर लीग 2026- चेन्नई सुपर किंग्स और मुंबई इंडियंस के बीच मुकाबला आज
इंडियन प्रीमियर लीग 2026- चेन्नई सुपर किंग्स और मुंबई इंडियंस के बीच मुकाबला आज
‘राजा शिवाजी’ की बॉक्स ऑफिस पर दमदार ओपनिंग, फिल्म ने पहले दिन कमाये इतने करोड़ रुपये
‘राजा शिवाजी’ की बॉक्स ऑफिस पर दमदार ओपनिंग, फिल्म ने पहले दिन कमाये इतने करोड़ रुपये
ओलावृष्टि से किसानों की फसलों को हुए नुकसान का शीघ्र आकलन कर रिपोर्ट प्रस्तुत करें- गणेश जोशी
ओलावृष्टि से किसानों की फसलों को हुए नुकसान का शीघ्र आकलन कर रिपोर्ट प्रस्तुत करें- गणेश जोशी
आज आपके फोन में आएगा अलर्ट, घबराएं नहीं
आज आपके फोन में आएगा अलर्ट, घबराएं नहीं
बौद्ध सर्किट कॉरिडोर में उत्तराखंड को शामिल कराने का होगा प्रयास- महाराज
बौद्ध सर्किट कॉरिडोर में उत्तराखंड को शामिल कराने का होगा प्रयास- महाराज
हिंसा किसी भी समस्या का समाधान नहीं, कानून हाथ में लेने वालों पर होगी कठोरतम कार्रवाई- कुसुम कंडवाल
हिंसा किसी भी समस्या का समाधान नहीं, कानून हाथ में लेने वालों पर होगी कठोरतम कार्रवाई- कुसुम कंडवाल
टेनिस बॉल क्रिकेट प्रतियोगिता का भव्य आगाज़
टेनिस बॉल क्रिकेट प्रतियोगिता का भव्य आगाज़
सफाई कर्मचारियों के अधिकारों एवं कल्याण पर विशेष जोर
सफाई कर्मचारियों के अधिकारों एवं कल्याण पर विशेष जोर
भाजपा की मानसिकता गरीब व मजदूर विरोधी- धस्माना
भाजपा की मानसिकता गरीब व मजदूर विरोधी- धस्माना

लोकतंत्र के लिए अहम

लोकतंत्र के लिए अहम

इलेक्ट्रॉल बॉन्ड योजना शुरू से विवादास्पद थी। जो अनुभव रहा, उससे इसके खिलाफ आरंभ ही कही गई बातें लगातार ठोस साबित होती गईं। इनके बीच यह तर्क महत्त्वपूर्ण था कि असीमित और गुप्त राजनीतिक चंदा स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव के तकाजे के खिलाफ है।
इलेक्ट्रॉल बॉन्ड योजना को रद्द कर सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय लोकतंत्र को मजबूत करने की दिशा में बड़ा योगदान किया है। यह योजना शुरू से विवादास्पद थी। जो अनुभव रहा, उससे इसके खिलाफ आरंभ ही कही गई बातें लगातार ठोस साबित होती गईं। इनके बीच दो तर्क महत्त्वपूर्ण थे- पहला यह कि असीमित और गुप्त राजनीतिक चंदा स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव के तकाजे के खिलाफ है।

दूसरी दलील यह थी कि इलेक्ट्रॉल बॉन्ड योजना में शामिल प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (ए) के तहत मिले सूचना के अधिकार का उल्लंघन हैं। इन दोनों ही तर्कों को अब सुप्रीम कोर्ट ने वाजिब ठहराया है। प्रधान न्यायाधीश जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि गुप्त चंदे का प्रावधान सूचना के अधिकार के खिलाफ है। इस प्रावधान के तहत एक और आपत्तिजनक बात यह रही है कि चंदा देने वाली कंपनियों की पहचान आम जन से तो छिपी रहती है, लेकिन सरकार को यह सब मालूम रहता है कि कौन किसको कितना चंदा दे रहा है। इससे इस आरोप को बल मिला कि कंपनियों के लिए विपक्षी दलों को चंदा देना जोखिम भरा हो गया है।

तमाम उपलब्ध आंकड़ों से इस बात की लगातार पुष्टि हुई है कि इलेक्ट्रॉल बॉन्ड्स के तहत दिए गए चंदे का अधिकांश हिस्सा सत्ताधारी दल को गया है। कोर्ट ने उचित ही यह कहा कि राजनीति चंदे के जरिए दाताओं की सत्ता के हलकों तक पहुंच बनती है। इस पहुंच से नीति निर्माण के प्रभावित होने का अंदेशा पैदा हो जाता है। सार्वजनिक दायरे में ये धारणा भी गहराई है कि वर्तमान सरकार और कुछ कॉरपोरेट घरानों के बीच ऐसे अंत:संबंध बन गए हैं, जिनसे देश की महत्त्वपूर्ण नीतियां प्रभावित हो रही हैं। इसलिए सुप्रीम कोर्ट का इस योजना को संचालित करने वाले भारतीय स्टेट बैंक को दिया गया यह आदेश अत्यंत महत्त्वपूर्ण है कि वह इस योजना के तहत पार्टियों को मिले चंदे की पूरी जानकारी निर्वाचन आयोग को दे। आयोग को उसे अपनी वेबसाइट पर प्रकाशित करना होगा। इस तरह अब उम्मीद है कि इस योजना का पूरा सच सामने आ जाएगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back To Top